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ट्रंप नई दिल्ली से रूस से दोस्ती कम करने को कह रहे हैं जबकि मोदी पुतिन के स्वागत में लाल कालीन बिछा रहे हैं

यह अनुवाद अंग्रेज़ी के मूल लेख Modi greets Putin with pomp and ceremony as Trump demands New Delhi downgrade its ties with Russia का है जो 16 दिसंबर 2025 को प्रकाशित हुआ था।

भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन 5 दिसंबर 2025 को नई दिल्ली के हैदराबाद हाउस में वार्ता के बाद संयुक्त बयान जारी करने के दौरान। (एपी फोटो/ अलेक्जेंडर कज़ाकोव, स्पुत्निक, क्रेमलिन पूल) [AP Photo/Alexander Kazakov, Sputnik, Kremlin Pool]

भारत ने इसी महीने की शुरुआत में रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के नई दिल्ली दौरे पर उनका भव्य स्वागत किया। इसकी शुरुआत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तय प्रोटोकॉल से हटकर पालम एयर बेस पर विमान से उतरते ही पुतिन से व्यक्तिगत रूप से मुलाकात की। और यह गर्मजोशी दो दिन के दौरे के दौरान जारी रहा, जिसका समापन व्यापार, निवेश, लेबर मोबिलिटी, रक्षा और अन्य क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने से जुड़े कई नए समझौतों पर हस्ताक्षर के साथ हुआ।

रूस के साथ अपनी दशकों पुरानी रणनीतिक साझेदारी की “गर्मजोशी“ और “मजबूती“ का भारत का जोर शोर से प्रदर्शन करना वॉशिंगटन को ये संदेश था कि नई दिल्ली अमेरिका को, मॉस्को के साथ रिश्ते को तय करने की इजाज़त नहीं देगा।

मोदी सरकार ने, कांग्रेस सरकार के समय बने भारत-अमेरिका वैश्विक रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाते हुए, अपने ग्यारह साल के कार्यकाल में वॉशिंगटन के साथ सैन्य और सुरक्षा संबंधों का तेज़ी से विस्तार किया है। इसके चलते अमेरिका की चीन के साथ रणनीतिक टकराव की नीति में भारत एक अहम अग्रिम मोर्चा बन गया है।

इसके बावजूद मोदी, उनकी बीजेपी सरकार और पूरे भारतीय शासक वर्ग की नाराज़गी के बीच, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप बार-बार भारत पर दबाव बनाते रहे हैं। ट्रंप भारत से अमेरिकी निर्यात और निवेश पर लगे बैरियर हटाने, रूस से तेल आयात बंद करने और मॉस्को के साथ रिश्तों को कम करने की मांग करते रहे हैं।

अगस्त के अंत से भारत के अधिकतर निर्यात पर अमेरिका में 50 प्रतिशत टैरिफ़ लगाया गया है। इसमें भारत के लिए अलग से लगाया गया 25 प्रतिशत का दंडात्मक टैरिफ़ भी शामिल है, जिसे वॉशिंगटन तब तक जारी रखने की बात कह रहा है, जब तक भारत रूसी तेल खरीदना पूरी तरह बंद नहीं कर देता। 50 प्रतिशत का यह टैरिफ़ चीन से भी अधिक है, जबकि चीन भी रूसी तेल का बड़ा आयातक है। यह दर किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है और भारत के कट्टर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान पर लगाए गए 19 प्रतिशत टैरिफ़ की तुलना में तो कहीं अधिक है।

इतने औपचारिक स्वागत और मोदी व पुतिन की ओर से भारत-रूस संबंधों की मजबूती के दावों के बावजूद, नई दिल्ली और मॉस्को ने किसी भी बड़े नए सैन्य या रक्षा समझौते की घोषणा नहीं की।

बीजेपी सरकार और भारतीय शासक वर्ग के नज़रिये से 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए पुतिन की यात्रा एक नाजुक संतुलन साधने की कोशिश का हिस्सा थी। भारत लंबे समय से रूस और अमेरिका व उसके नेटो साझेदारों के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक विभाजन के बीच संतुलन बनाने की नीति अपनाता रहा है। हालांकि अमेरिका-नेटो की पहल पर शुरू हुए यूक्रेन युद्ध के बाद यह संतुलन बनाना और ज़्यादा कठिन हो गया है।

डोनाल्ड ट्रंप इस स्थिति को और जटिल बनाते हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद की आर्थिक और भू-राजनीतिक ताक़त में तेज़ी से हो रही गिरावट को रोकने की हताश कोशिश में ट्रंप अमेरिका के घोषित रणनीतिक दुश्मनों के साथ-साथ प्रत्यक्ष सहयोगियों पर भी आक्रामक रुख़ अपनाए हुए हैं।

4 और 5 दिसंबर को हुई पुतिन की यह यात्रा यूक्रेन युद्ध शुरू होने के बाद उनकी भारत की पहली यात्रा थी। पश्चिमी देशों के रूस को अलग-थलग करने में नाकाम रहने को दिखाने के लिए पुतिन ने अपने भारतीय मेज़बानों की तरह ही, हर मौके पर रूस-भारत संबंधों की मजबूती का बार बार बखान किया।

इंडिया टुडे को दिए एक इंटरव्यू में पुतिन ने कहा कि वह अपने “मित्र” मोदी से मिलकर “बहुत खुश” हैं। उन्होंने जहाज और विमान निर्माण, परमाणु ऊर्जा और अंतरिक्ष अनुसंधान में दोनों देशों के सहयोग की सराहना की।

पुतिन ने भारत पर सस्ता रूसी तेल आयात बंद करने के लिए अमेरिका के दबाव की भी आलोचना की। उन्होंने वही बात दोहराई, जो भारतीय सरकारी अधिकारी बार-बार कहते रहे हैं कि अमेरिका और यूरोप अब भी रूसी ऊर्जा का आयात कर रहे हैं, जिसमें यूरेनियम और तरलीकृत प्राकृतिक गैस शामिल है। पुतिन ने कहा, “अगर अमेरिका को हमारा ईंधन खरीदने का अधिकार है, तो भारत को वही अधिकार क्यों नहीं होना चाहिए।”

पुतिन के साथ एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी आया था। इसमें रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलोउसव, प्रथम उप प्रधानमंत्री और उद्योग मंत्री डेनिस मंतुरोव, केंद्रीय बैंक की गवर्नर एल्विरा नाबिउलिना और प्रमुख कारोबारी नेता शामिल थे।

शिखर सम्मेलन के दौरान भारत और रूस के बीच 16 समझौते हुए। ये समझौते व्यापार और परमाणु ऊर्जा से लेकर स्वास्थ्य, संस्कृति और आतंकवाद विरोधी सहयोग जैसे कई क्षेत्रों से जुड़े थे।

पुतिन और मोदी ने 2030 तक रूस-भारत के वार्षिक व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य तय किया। यह मौजूदा स्तर से करीब 50 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। दोनों नेताओं ने रूसी व्यापार पर अमेरिकी प्रतिबंधों से बचने के मकसद से भारत की RuPay भुगतान प्रणाली और रूस की Mir भुगतान प्रणाली को जोड़ने में हुई प्रगति का भी ज़िक्र किया। रुपये-रूबल आधारित ऐसे भुगतान और विनिमय तंत्र की स्थापना इसलिए अहम मानी जा रही है, क्योंकि भारत वॉशिंगटन और नेटो देशों के दबाव के बावजूद सस्ते रूसी तेल की बड़े पैमाने पर खरीद से लाभ उठाता रह सके।

मोदी ने रूसी नेतृत्व वाले यूरेशियन इकोनॉमिक यूनियन (यूईयू) के साथ संभावित मुक्त व्यापार समझौते की दिशा में हुई प्रगति को भी रेखांकित किया। यह संगठन सोवियत संघ के बाद बने पांच देशों का क्षेत्रीय समूह है, जिसकी अगुवाई रूस करता है।

रक्षा के मामले में भारत और रूस ने अपने लंबे समय से चले आ रहे करीबी रक्षा सहयोग की फिर पुष्टि की। दोनों देशों ने संयुक्त हथियार उत्पादन, तकनीक हस्तांतरण और पहले से दिए गए ऑर्डर की तेज आपूर्ति से जुड़े नए समझौतों पर हस्ताक्षर किए।

हालांकि बड़े नए हथियार सौदों को लेकर नई दिल्ली ने फिलहाल इंतज़ार और स्थिति पर नज़र रखने का रुख़ अपनाया है। इसकी वजह वॉशिंगटन के साथ रिश्तों को किसी तरह संभालने की कोशिश मानी जा रही है।

भारतीय सरकारी अधिकारी बार-बार यह दावा करते रहे हैं कि ट्रंप के साथ कम से कम एक अंतरिम व्यापार समझौता जल्द हो सकता है। लेकिन पिछले हफ्ते हुई तीन दिन की व्यापार वार्ताएं बिना किसी नतीजे के ख़त्म हो गईं। इसी बीच अमेरिका के राष्ट्रपति ने भारत पर एक और हमला बोलते हुए कहा कि वह भारतीय चावल पर टैरिफ़ और बढ़ा सकते हैं, जो पहले ही 50 से 53 प्रतिशत के बीच है और इससे ज़्यादा हो सकता है।

इससे पहले यह चर्चा थी कि नई दिल्ली रूस के साथ सुखोई-57 पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान, उन्नत हेलीकॉप्टर और रूस की नई एस-500 ‘प्रोमेथियस’ वायु रक्षा प्रणाली खरीदने के समझौते कर सकती है। लेकिन भारत-रूस शिखर सम्मेलन में ऐसे किसी भी सौदे की घोषणा नहीं हुई।

रूसी रक्षा मंत्री आंद्रेई बेलोउसव ने अपने भारतीय समकक्ष राजनाथ सिंह के साथ विस्तृत बातचीत की। बेलोउसव ने भरोसा दिलाया कि रूस और उसका रक्षा उद्योग भारत को रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने में मदद के लिए तैयार है। भारत इस समय वैश्विक हथियार आयात का 8.3 प्रतिशत हिस्सा रखता है और इस मामले में यूक्रेन (8.8 प्रतिशत) के बाद वो दूसरे स्थान पर है। यूक्रेन को अमेरिका और नेटो देशों ने भारी मात्रा में हथियार मुहैया कराए हैं, ताकि उसकी सैन्य हार को रोका जा सके।

भारत रूस की एस-400 वायु रक्षा प्रणाली की पांच यूनिट खरीद चुका है और मौजूदा ऑर्डर की आपूर्ति तय समय से पीछे रहने के कारण जल्द से जल्द डिलीवरी पाना चाहता है। भारत ने अक्टूबर 2018 में रूस के साथ पांच एस-400 स्क्वाड्रन के लिए 5.43 अरब डॉलर का समझौता किया था, लेकिन अब तक केवल तीन ही मिल पाए हैं। हालांकि 2018 में अमेरिका ने CAATSA कानून के तहत भारत पर प्रतिबंध लगाने की धमकी दी थी, लेकिन एस-400 की पहली खेप मिलने के बाद बाइडेन प्रशासन ने अंततः प्रतिबंध न लगाने का फैसला किया। इसका मकसद चीन के ख़िलाफ़ अमेरिकी युद्ध तैयारियों में भारत के बढ़ते एकीकरण को बाधित होने से बचाना था।

मोदी के नेतृत्व में भारत ने अमेरिका और उसके प्रमुख एशिया-प्रशांत सहयोगियों जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ द्विपक्षीय, त्रिपक्षीय और चतुष्पक्षीय साझेदारियों का तेज़ी से विस्तार किया है। इसमें अमेरिका के नेतृत्व वाला क्वाड भी शामिल है।

पिछले साल मई में पाकिस्तान के साथ चार दिन चले संघर्ष में एस-400 एयर डिफ़ेंस सिस्टम ने कथित रूप से अहम भूमिका निभाई। सीमित युद्ध की शुरुआत में पाकिस्तान ने भारतीय हवाई क्षेत्र में प्रवेश किए बिना कई भारतीय लड़ाकू विमानों को गिराकर बढ़त हासिल की थी, उसके बाद भारत ने इस सिस्टम की मदद से पाकिस्तानी ड्रोन और मिसाइल हमलों का जवाब दिया। हालांकि 10 मई को एक नाजुक युद्धविराम लागू हुआ, लेकिन तनाव अब भी बना हुआ है। मोदी सरकार भारत-पाकिस्तान संबंधों को अपनी शर्तों पर नए सिरे से परिभाषित करने की कोशिश कर रही है, जिसमें सिंधु जल संधि से हटने का कदम भी शामिल है।

अमेरिकी दबाव में हाल के वर्षों में भारत ने रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता घटाई है। इसके बावजूद रूस अब भी भारत का अहम रक्षा साझेदार बना हुआ है। वह भारत की मौजूदा हथियार प्रणालियों का बड़ा हिस्सा सप्लाई करता है, जिसमें लड़ाकू विमान, टैंक और मिसाइलें शामिल हैं, साथ ही उन्हें चालू रखने के लिए ज़रूरी पुर्जे भी देता है। रूस के साथ संयुक्त रूप से विकसित ब्रह्मोस मिसाइल भारत की सबसे उन्नत और व्यापक रूप से निर्यात की जाने वाली मिसाइल प्रणालियों में गिनी जाती है।

पाकिस्तान के साथ हालिया सीमा युद्ध के बाद भारत ने युद्ध सामग्री को तेज़ी से इकट्ठा करने का अभियान शुरू किया। और कई मामलों में रूस ही एकमात्र या सबसे उपयुक्त आपूर्तिकर्ता साबित हुआ।

इसी दौरान नई दिल्ली, जो पहले से ही हथियारों पर निर्भरता के जरिये सहयोगी देशों को नियंत्रित करने के वॉशिंगटन के लंबे रिकॉर्ड को लेकर सतर्क थी, ट्रंप के भारत के ख़िलाफ़ अचानक रुख़ से और ज़्यादा परेशान हो गई। इसमें ट्रंप का भारत को अपने वैश्विक व्यापार युद्ध का खास निशाना बनाना, रूस के साथ भारत के संबंधों को निर्देशित करने की कोशिश करना शामिल है। साथ ही अमेरिका के पाकिस्तान के साथ रिश्तों में अचानक नरमी भी देखने को मिली है, जो भारत की नाराज़गी के बावजूद हालिया भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद भी जारी रही।

भारतीय शासक वर्ग मॉस्को के साथ अपने तथाकथित “सदाबहार” गठबंधन को बनाए रखने को लेकर चिंतित है। इसी कारण मोदी और उनकी हिंदुत्ववादी बीजेपी, जो अब तक वॉशिंगटन के प्रति अत्यधिक झुकाव के लिए जानी जाती रही है, ट्रंप प्रशासन के ख़िलाफ़ कुछ हद तक प्रतिरोध दिखाने को मजबूर हुई है।

इसका एक पहलू बीजिंग की ओर पहल भी है। अगस्त के अंत में मोदी शंघाई सहयोग संगठन शिखर सम्मेलन के लिए चीन गए। सात साल में यह उनकी पहली चीन यात्रा थी। इससे मई 2020 में शुरू हुए भारत-चीन सीमा गतिरोध में उल्लेखनीय तनाव कम हुआ। इस गतिरोध के दौरान दोनों देशों ने अपने विवादित हिमालयी सीमा क्षेत्र में हजारों सैनिक, टैंक और लड़ाकू विमान कई वर्षों तक तैनात कर रखे थे।

इसके बावजूद ट्रंप प्रशासन के साथ मौजूदा टकरावों के बाद भी भारत-अमेरिका रणनीतिक साझेदारी मोदी, उनकी बीजेपी सरकार और भारतीय पूंजीपति वर्ग की विदेश और भू-राजनीतिक नीति की बुनियाद बनी हुई है।

अक्टूबर के अंत में राजनाथ सिंह और अमेरिका के युद्ध मंत्री पीट हेगसेथ ने एक नया 10 साल का भारत-अमेरिका रक्षा ढांचा समझौता किया। दोनों पक्षों के अनुसार, इसका उद्देश्य थल, वायु, समुद्र, अंतरिक्ष और साइबर क्षेत्रों में सहयोग को गहरा करना है, साथ ही संयुक्त अभ्यास, सह-उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण को बढ़ावा देना है, जिसमें क्वाड भी शामिल है। समझौते के बाद सिंह ने भारत-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका और भारत के रणनीतिक “सामंजस्य” की बात कही। यह क्षेत्र वास्तव में अमेरिका-चीन युद्ध परिदृश्य को दर्शाता है।

संयुक्त सैन्य अभ्यास लगातार बढ़ रहे हैं। 2025 में टैरिफ़ तनाव के बीच भारत और अमेरिका ने पांच संयुक्त अभ्यास किए। इनमें अप्रैल में टाइगर ट्रायम्फ, अगस्त से सितंबर के बीच ब्राइट स्टार और 1 से 14 सितंबर तक अलास्का में युद्ध अभ्यास शामिल रहे। युद्ध अभ्यास 2025 में भारत की मद्रास रेजिमेंट और अमेरिका की फर्स्ट एयरबोर्न डिविजन के 450-450 सैनिक शामिल हुए। इन अभ्यासों में हेलिबोर्न ऑपरेशन, यूएवी का इस्तेमाल, घायलों की निकासी और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर पर जोर रहा। यह सब पहाड़ी इलाकों और हिमालय जैसे ख़राब मौसम वाले हालात में किया गया। अभ्यास का समापन लाइव फायर ड्रिल के साथ हुआ।

भारत इसराइल के साथ भी अपने संबंध मजबूत करता जा रहा है। भारत ने ग़ज़ा में इसराइल की कार्रवाई का अमेरिका और अन्य साम्राज्यवादी ताकतों के साथ खुलकर समर्थन किया है। इसराइल के प्रधानमंत्री और युद्ध अपराधी बिन्यामिन नेतन्याहू के इस महीने के अंत में भारत आने की संभावना है। मोदी की हिंदुत्ववादी बीजेपी का नेतन्याहू के ज़ायनिस्ट आंदोलन के फासीवादी धड़े के साथ वैचारिक मेल माना जाता है। लेकिन भारत-इसराइल गठजोड़ असल में अमेरिका के साथ नजदीकी बढ़ाने की नई दिल्ली की नीति से जुड़ा है। इसमें वॉशिंगटन की उस रणनीति का समर्थन और उससे लाभ की उम्मीद भी शामिल है, जिसके तहत आक्रामकता और युद्ध के जरिए एक “नया मध्य पूर्व” और इसराइल आधारित भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा बनाने की कोशिश की जा रही है।

पुतिन की भारत यात्रा से पहले के दिनों में कूटनीतिक गतिविधियां तेज रहीं। ट्रंप नेटो सहयोगियों को दरकिनार करते हुए रूस के साथ एक कथित शांति समझौता कराने का प्रयास कर रहे थे।

भारतीय शासक वर्ग ऐसे किसी समझौते की संभावना को आम तौर पर अपने पक्ष में मानता है। उसका मानना है कि रूस और अमेरिका के रिश्तों में सुधार से भारत को फायदा होगा और चीन को नुकसान पहुंचेगा। भारत, चीन को दक्षिण एशिया में क्षेत्रीय वर्चस्व और वैश्विक ताकत बनने की राह में सबसे बड़ी बाधा मानता है। इसी तरह ट्रंप की पिछले जनवरी में सत्ता में वापसी को भी भारत ने सकारात्मक रूप में देखा था। यह आकलन किया गया था कि ट्रंप चीन के साथ टकराव को प्राथमिकता देंगे और भारत के साथ करीबी रिश्तों को बढ़ाएंगे। इसमें भारत को चीन के विकल्प के रूप में उत्पादन केंद्र बनाने की उसकी महत्वाकांक्षा को पंख लग सकते हैं।

नई दिल्ली रूस और अमेरिका दोनों के साथ मजबूत रिश्ते बनाए रखने की कोशिश में संतुलन साध रही है, ताकि उसके रणनीतिक हितों को नुकसान न पहुंचे। फिलहाल कुछ भी निश्चित नहीं कहा जा सकता। यूक्रेन युद्ध को रोकने के लिए अगर कोई समझौता हो भी जाता है, तब भी यह तय नहीं है कि ट्रंप भारत की कथित आर्थिक और भू-राजनीतिक कमजोरी का इस्तेमाल कर नई दिल्ली पर मॉस्को के साथ रिश्ते कमजोर करने का दबाव डालना बंद कर देंगे।

पुतिन की भारत यात्रा यह दिखाती है कि वैश्विक आर्थिक, कूटनीतिक और रणनीतिक रिश्ते कितने तेज़ी से बदल रहे हैं और कितने अस्थिर व विस्फोटक हो चुके हैं। यह भी साफ़ होता है कि भारतीय पूंजीपति वर्ग के अपने आक्रामक वैश्विक हितों को आगे बढ़ाने के लिए “रणनीतिक स्वायत्तता” का रास्ता अपनाने की नई दिल्ली की कोशिशें कितनी जोखिम भरी हैं।

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