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मतदाता सूचियों की सफ़ाई के ख़िलाफ़ प्रदर्शनों को कुचलने के लिए मोदी सरकार ने बड़े पैमाने पर दमन का सहारा लिया

यह अनुवाद अंग्रेज़ी Modi government unleashes massive repression to crush protests against purge of India’s electoral rolls के मूल का है जो 11 October 2026 को प्रकाशित हुआ था।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को भारत के नई दिल्ली में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर हुए युवा प्रदर्शन के दौरान पुलिस एक प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेती हुई। (एपी फ़ोटो/विपिन) [AP Photo/Vipin]

भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की मांग को लेकर हाल के दिनों में दिल्ली, मुंबई और अन्य शहरों में भारी प्रदर्शन आयोजित हुए।

हिंदू वर्चस्ववादी नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी सरकार ने दमन का ऐसा अभियान चलाया है, जिसका उदाहरण प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के समय भी नहीं देखने को मिला था, जब उन्होंने मई 1974 में रेलवे कर्मचारियों की देशव्यापी हड़ताल को कुचलने के लिए सेना तैनात कर दी थी। इसके बाद अगले साल जून में उन्होंने देश में इमरजेंसी लगा दिया था।

तानाशाही शासन को मज़बूत करने की दिशा में एक बड़े क़दम के तौर पर मोदी सरकार, एक तेज़ी से बढ़ते विपक्षी आंदोलन को अपराध की श्रेणी में लाने की पुरजोर कोशिश कर रही है। इस आंदोलन ने देशभर के छात्रों और हाल ही में कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने वाले युवाओं को एकजुट किया है और अब इसमें आबादी के दूसरे बड़े हिस्से भी शामिल हो रहे हैं।

शनिवार, 10 अक्टूबर को देश की राजधानी दिल्ली को एक छावनी में तब्दील कर दिया गया। सरकार ने संसद भवन के पास पारंपरिक प्रदर्शन स्थल जंतर-मंतर पर किसी बड़े प्रदर्शन को रोकने के लिए हर संभव क़दम उठाया।

बीजेपी के नियंत्रण वाली केंद्र और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) की सरकारों ने हज़ारों अर्धसैनिक बलों को तैनात किया। इन बलों ने केंद्र सरकार के नियंत्रण वाली दिल्ली पुलिस की मदद की, ताकि प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही उसे कुचल दिया जाए। इस बीच, उत्तर और पश्चिम भारत में बीजेपी की राज्य सरकारों ने भी अपने विरोधियों को दिल्ली पहुंचने से रोकने की पुरजोर कोशिश की।

इसके बावजूद, हज़ारों लोगों ने शनिवार को दिल्ली में साहसिक विरोध जताते हुए प्रदर्शन किया। रविवार को भी अचानक जुटे समूहों के साथ विरोध प्रदर्शन जारी रहे।

शनिवार को जंतर-मंतर पर होने वाले प्रदर्शन से पहले और उसके दौरान देशभर में 7,000 से अधिक और संभवतः 15,000 तक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में कई प्रदर्शनकारी नेता और विपक्षी राजनेता भी शामिल थे। अधिकारियों ने ज़रूरी परिवहन सेवाएं बंद कर दीं। वहीं, पुलिस की मौजूदगी में सरकार समर्थक हिंदू वर्चस्ववादी गुंडों ने प्रदर्शनकारियों पर खुलेआम हमला किया।

इन प्रदर्शनों की शुरुआत इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट के बाद हुई। रिपोर्ट में खुलासा किया गया कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कथित तौर पर स्पेशल इंटेंसिव रिविज़न (एसआईआर) नाम की प्रक्रिया के ज़रिए मतदाता सूचियों से बड़े पैमाने पर अवैध रूप से नाम हटाने का निर्देश दिया। मतदाता सूची से 13 से 15 करोड़ नाम हटाए जा चुके हैं। इनमें ज़्यादातर ग़रीब लोग, प्रवासी मज़दूर, दलित और मुसलमान हैं। यह मतदाताओं को उनके अधिकार से वंचित करने की एक विशाल मुहिम है, जिसका सीधा निशाना आबादी के वे हिस्से हैं जो बीजेपी का विरोध करते हैं।

इन प्रदर्शनों का नेतृत्व कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) कर रही है। यह हाल ही में बना जेन ज़ी आंदोलन है, जिसका नेतृत्व बोस्टन यूनिवर्सिटी से प्रशिक्षित कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट अभिजीत दीपके कर रहे हैं। इसके साथ स्टालिनवादी और कांग्रेस पार्टी के छात्र संगठन भी शामिल हैं। इनमें सीपीआई-एमएल से जुड़ा ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा) भी शामिल है।

दो प्रमुख स्टालिनवादी पार्टियां, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीएम) और पुरानी व छोटी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया (सीपीआई), साथ ही माओवादी सीपीआई एमएल लिबरेशन, कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाले विपक्षी इंडिया गठबंधन में सक्रिय रूप से शामिल हैं।

डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस ने अपने लेखों में बताया है कि सीजेपी एक 'राजनीतिक सेफ़्टी वॉल्व' है। इसका मक़सद भारत के वंचित युवाओं को पूंजीवादी राजनीति के दायरे में बनाए रखना है। स्टालिनवादी 'वामपंथी' पार्टियां दशकों पहले पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी हैं। अब वे प्रदर्शन आंदोलन को इंडिया गठबंधन के पीछे एकजुट करने की कोशिश कर रही हैं। इस गठबंधन का मक़सद 2029 में होने वाले अगले चुनाव में मोदी की जगह एक दक्षिणपंथी पूंजीवादी सरकार लाना है। यह सरकार बीजेपी की 'निवेशक परस्त' नीतियों और अमेरिकी साम्राज्यवाद के साथ भारत की सैन्य और रणनीतिक साझेदारी को बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध होगी।

इनमें से कोई भी संगठन मोदी सरकार को गिराने की मांग नहीं कर रहा है। इसके बजाय, वे आंदोलन को ज्ञानेश कुमार को हटाने और एसआईआर के तहत मतदाता सूची में संशोधन रोकने की मांग तक सीमित रखना चाहते हैं। ये सभी ताक़तें मोदी सरकार और उसके पीछे खड़े भारतीय पूंजीपति वर्ग के ख़िलाफ़ मज़दूर वर्ग की सामाजिक ताक़त को संगठित करने का कड़ा विरोध करती हैं। वे लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा के संघर्ष को पूंजीवादी कुलीनतंत्र के ख़िलाफ़ लड़ाई और मज़दूरों के सामाजिक अधिकारों की मांग से जोड़ने के भी ख़िलाफ़ हैं।

नाकाबंदी में एक शहर

दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर के प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया। पुलिस ने आवेदन देर से जमा करने का हवाला दिया। यह आवेदन प्रदर्शन से तीन दिन पहले दिया गया था। पुलिस ने पहले के एक प्रदर्शन के दौरान कथित नियम उल्लंघन का भी ज़िक्र किया। सरकार ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 163 लागू कर दी। यह भारत की आपराधिक क़ानून संहिता का हिस्सा है और इसके तहत नई दिल्ली ज़िले में किसी भी सभा या प्रदर्शन पर रोक लगाई जा सकती है।

शनिवार के प्रदर्शन से पहले ही व्यापक दमन शुरू कर दिया गया था। सरकार ने शुक्रवार शाम से दिल्ली मेट्रो के 45 स्टेशन बंद करने का आदेश दिया। राजधानी में 41,000 पुलिसकर्मियों और अर्धसैनिक बलों को तैनात किया गया।

अधिकारियों ने जंतर-मंतर के प्रदर्शन स्थल से चार किलोमीटर के दायरे में 24 घंटे के लिए मोबाइल फ़ोन और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दीं। सुरक्षा बलों ने दिल्ली में आने वाली प्रमुख सड़कों, रेलवे स्टेशनों, बस अड्डों और होटलों पर लोगों की सघन जांच की। वे स्कूलों में भी पहुंचे, जहां छात्रों और शिक्षकों को प्रदर्शन में शामिल न होने की हिदायत दी गई।

सबसे असाधारण क़दम के तौर पर रेल मंत्रालय ने दिल्ली पहुंचने वाली और दिल्ली से रवाना होने वाली 75 मेल और एक्सप्रेस ट्रेनें रद्द कर दीं। इसके लिए 'भीड़भाड़ की आशंका' का हवाला दिया गया। शनिवार को नई दिल्ली और हज़रत निज़ामुद्दीन स्टेशनों पर लगभग 165 ट्रेनों को पहुंचना था। इनमें से 40 ट्रेनें रद्द कर दी गईं। इनमें कानपुर शताब्दी एक्सप्रेस, लखनऊ मेल और हावड़ा राजधानी भी शामिल थीं। दिल्ली से रवाना होने वाली 35 ट्रेनें भी रद्द कर दी गईं।

रेलवे के एक अनुभवी अधिकारी ने प्रेस से कहा कि 'सड़क पर भीड़भाड़' के कारण ट्रेनों को रद्द करना हाल के रेलवे इतिहास में 'अभूतपूर्व' है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र परिवहन निगम ने भी सराय काले खां और न्यू अशोक नगर स्थित अपने नमो भारत स्टेशन बंद कर दिए।

इंडियन एक्सप्रेस ने उस पूरी कार्रवाई का ब्यौरा दिया, जिसे उसने '37 बिंदुओं वाला घेराबंदी अभियान' कहा। दिल्ली पुलिस जिस केंद्रीय गृह मंत्रालय को रिपोर्ट करती है, उसने सोमवार तक केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों की 221 कंपनियां, यानी लगभग 23,000 जवान, तैनात किए। 

शहर के अलग-अलग ज़िलों में 15 हिरासत केंद्र तैयार किए गए। इनमें बवाना और छत्रसाल के स्टेडियम भी शामिल थे। होटलों और गेस्ट हाउसों को निर्देश दिया गया कि वे 'ऐसे नए मेहमानों को न ठहराएं, जिनके प्रदर्शन में शामिल होने के लिए आने की आशंका हो।' पुलिस ने कैब सेवा देने वाली कंपनियों ओला और उबर के साथ तालमेल किया, ताकि 'मध्य दिल्ली की ओर आवाजाही को नियंत्रित किया जा सके।'

पुलिस अधिकारी प्रदर्शनकारियों के तौर पर पहचाने गए लोगों के गृह नगरों में भी पहुंचे और उन्हें दिल्ली न आने की सलाह दी। इस क़दम की आलोचना करते हुए इसे व्यवहार में नज़रबंदी जैसा बताया गया।

मध्य प्रदेश जैसे बीजेपी शासित राज्यों में पुलिस ने महाराष्ट्र से नई दिल्ली जा रहे युवाओं को ट्रेन में ही हिरासत में ले लिया। मुंबई, ठाणे, नागपुर और पुणे में कार्यकर्ताओं ने बताया कि पुलिस उनके घर पहुंची या ट्रेन में उन्हें फ़ोन किया और फिर हिरासत में ले लिया। महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक ने बाद में माना कि उन्होंने इन कार्रवाइयों का आदेश दिया था। बीजेपी शासित गुजरात में पुलिस ने सरकार विरोधी कार्यकर्ताओं से लिखित आश्वासन लिया कि वे दिल्ली नहीं जाएंगे।

शनिवार को दक्षिणपंथी हिंदू वर्चस्ववादी संगठनों ने प्रदर्शनकारियों और पत्रकारों पर हमले किए। उनके कई गुंडों ने पुलिसकर्मियों के सामने प्रदर्शनकारियों को पीटा। दिल्ली के बीचोंबीच कनॉट प्लेस में हिंदुस्तान टाइम्स के पत्रकारों ने ऐसी पिटाई देखी, जबकि भारी हथियारों से लैस पुलिसकर्मी मूकदर्शक बने रहे।

अप्रैल में भी इसी तरह की कार्रवाई की गई थी। उस समय नोएडा और मानेसर के औद्योगिक इलाकों में हज़ारों ठेका मज़दूरों ने शोषण के खिलाफ हड़ताल की थी। उनसे 12 से 14 घंटे तक काम कराया जाता था, उन्हें बेहद कम मज़दूरी मिलती है और ओवरटाइम के नियमों का नियमित रूप से उल्लंघन किया जाता है।

डब्ल्यूएसडब्ल्यूएस ने विस्तार से बताया है कि भारतीय राज्य ने इसके जवाब में बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां कीं, यातनाएं दीं, एहतियाती हिरासत में रखा और औपनिवेशिक दौर के राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (एनएसए) का इस्तेमाल किया। इस क़ानून के तहत बिना आरोप तय किए या मुक़दमा चलाए किसी को जेल में रखा जा सकता है।

कई मज़दूर अब भी हिंसा के मनगढ़ंत आरोपों में जेल में बंद हैं। मज़दूर कार्यकर्ताओं आदित्य आनंद, रुपेश रॉय, मनीषा चौहान, हिमांशु ठाकुर, सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी को एनएसए के तहत हिरासत में रखा गया है। रुपेश रॉय ने आरोप लगाया कि हिरासत में उनके साथ 'बर्बर हिंसा' की गई। उनका कहना है कि पुलिस ने उनके पास मिट्टी के तेल की बोतलें और मशाल की लकड़ियां रख दीं, फिर वीडियो बनाते हुए उन्हें इन्हें उठाने के लिए मजबूर किया।

बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियां

शनिवार को दिल्ली पुलिस ने 4,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। इनमें से ज़्यादातर को जंतर-मंतर पहुंचने से पहले ही पकड़ लिया गया और बसों और वैन में भरकर स्टेडियमों और अस्थायी हिरासत केंद्रों में ले जाया गया।

राष्ट्रीय राजधानी पहुंचने पर सीजेपी नेताओं अभिजीत दिपके, आशुतोष रांका और सौरव दास को हिरासत में ले लिया गया। इंडिया गठबंधन के कई नेताओं को भी प्रदर्शन में शामिल होने की कोशिश के दौरान हिरासत में लिया गया। इनमें राज्यों के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, ममता बनर्जी, पिनराई विजयन और माणिक सरकार शामिल थे।

लगभग 24 घंटे हिरासत में रखने के बाद सीजेपी नेताओं को रिहा कर दिया गया। रविवार, 11 अक्टूबर को मीडिया से बात करते हुए सीजेपी के सह-संयोजक सौरव दास ने कहा, 'सरकार ने अपने ही नागरिकों के साथ जंग छेड़ रखी है...पूरे देश में खुले तौर पर आपातकाल जैसी स्थिति है।'

दास के मुताबिक़, हिरासत में लिए जाने के बाद पुलिस ने उन्हें अपने वकीलों से बात करने की अनुमति नहीं दी। उन्होंने आशंका जताई कि पुलिस ने उनके जो फ़ोन ज़ब्त किए हैं, उन्हें हैक किया जा सकता है और उनमें 'सबूत' डाले जा सकते हैं।

सीजेपी नेता अजिंक्य शिंदे ने दीपके की हिरासत के बाद प्रदर्शन का नेतृत्व करने की ज़िम्मेदारी संभाली। उन्होंने कहा, 'अब से हर दिन जंतर-मंतर तक मार्च निकाला जाएगा, जब तक ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से हटा नहीं दिया जाता।'

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर ख़ुद को हिंदू वर्चस्ववादी सरकार की सत्तावादी कार्रवाइयों पर मुहर लगाने वाली संस्था के रूप में दिखाया है। शनिवार के प्रदर्शन पर रोक को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान, जिनमें सीपीएम महासचिव एम.ए. बेबी की याचिका भी शामिल थी, मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने कहा कि सरकार 'मक्खी मारने के लिए हथौड़े का इस्तेमाल नहीं कर सकती।'

इसके बाद उन्होंने अधिकारियों को ट्रेन और मेट्रो सेवाओं पर लगाई गई रोक को कुछ हद तक कम करने का निर्देश दिया। हालांकि, उन्होंने साफ़ कर दिया कि अदालत की मुख्य चिंता नागरिकों के लोकतांत्रिक प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करना नहीं, बल्कि परिवहन सेवाएं बाधित होने से यात्रियों और कारोबारियों को होने वाली 'अनुचित परेशानी' है।

यह अदालत के पिछले रिकॉर्ड के अनुरूप है। सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर प्रक्रिया को भी मंज़ूरी दी थी। जब पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से हटाए गए नामों की बड़ी संख्या को नज़रअंदाज़ करना असंभव हो गया, तो अदालत ने संशोधन के अंतिम चरण की ज़िम्मेदारी न्यायिक अधिकारियों को सौंप दी, लेकिन मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया जारी रहने दी।

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ही थे, जिन्होंने बेरोज़गार युवाओं को 'परजीवी' और 'कॉकरोच' कहा था। उनकी इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर बड़ा विवाद हुआ, जिसके बाद सीजेपी का गठन हुआ।

नोएडा मामले में सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने यातना झेल चुके हिरासत में बंद लोगों की बात सीधे सुनी। इसके बावजूद अदालत ने उन्हें एनएसए के तहत हिरासत में रखने का आदेश दिया और कहा कि 'क़ानून को अपना काम करना होगा।'

विपक्ष ने जवाब में उन्हीं सरकारी संस्थाओं से अपील की है, जो दमन कर रही हैं। विपक्षी नेताओं ने स्थिति को 'आपातकाल जैसी' बताते हुए शुक्रवार को संसद भवन से राष्ट्रपति भवन तक मार्च निकाला। वे बीजेपी के समर्थक राष्ट्रपति से राहत की अपील करने पहुंचे।

स्टालिनवादी सीपीएम इस पूरे दिखावे का अभिन्न हिस्सा है। 'बीजेपी से लड़ने' के नाम पर सीपीएम और सीपीआई दशकों से दक्षिणपंथी सरकारों को सहारा बनी हुई हैं। उन्होंने वर्ग संघर्ष को दबाया है और मज़दूर वर्ग को कांग्रेस पार्टी और दूसरी दक्षिणपंथी जाति-आधारित और क्षेत्रीय पार्टियों से बांधे रखा है।

प्रदर्शन आंदोलन के प्रति मोदी सरकार की प्रतिक्रिया ताक़त से नहीं, बल्कि डर से पैदा हुई है। सरकार जानती है कि वह एक ऐसे समाज के ऊपर बैठी है, जिसमें बड़े पैमाने पर असंतोष जमा है और कभी भी विस्फोट हो सकता है।

सबसे अहम सवाल यह है कि वर्ग संघर्ष के तरीकों का इस्तेमाल करते हुए मज़दूर वर्ग की सामाजिक ताक़त को कैसे संगठित किया जाए। इसका मतलब उन सभी ताक़तों का विरोध करना है, ख़ास तौर पर स्टालिनवादियों का, जो ख़ुद को वामपंथी बताती हैं और युवाओं, मज़दूरों और ग्रामीण मेहनतकशों को कांग्रेस और दूसरी पूंजीवादी पार्टियों का पिछलग्गू बनाना चाहती हैं। ये ताक़तें उन्हें भारतीय पूंजीवादी 'लोकतंत्र' की जर्जर संस्थाओं से भी बांधे रखना चाहती हैं।

मतदाता सूची से नाम हटाने के ख़िलाफ़ संघर्ष और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई को पूरी पूंजीवादी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष और समाज के समाजवादी पुनर्गठन की मांग से जोड़ना होगा।

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